राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में हुआ, बरदईहा का नाट्य मंचन,
बरदईहा — एक प्रेम कहानी’ महज एक कथा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की धड़कनों को शब्द,

राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में हुआ, बरदईहा का नाट्य मंचन,
बरदईहा — एक प्रेम कहानी’ महज एक कथा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की धड़कनों को शब्द,
प्रदीप बोरकर खैरागढ़। राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कैंपस-2 प्रेक्षागृह में नाट्य विभाग के विद्यार्थियों द्वारा मंचित नाटक ‘बरदईहा — एक प्रेम कहानी’ महज एक कथा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की धड़कनों को शब्द, सुर और अभिनय में पिरोने का एक साहसिक प्रयास किया गया।
निर्देशक डॉ. शिशु कुमार सिंह ने मंच को एक जीवंत गांव में बदल दिया — झोपड़ी, पेड़, चारा खाती गाय और मद्धम रोशनी के बीच लेखक दीपक कुमार साहू की कलम से निकली कहानी सांस लेने लगी। यह कहानी है बरदईहा मंगलु (खगेश पैकरा) और गौटिया की बेटी सुखिया (आकाशी मेश्राम) की, जिनका प्रेम सामाजिक असमानता की चट्टान से टकराकर चूर-चूर हो जाता है।
खोरबहरा (काव्य त्रिमले) के क्रोध, गुरू (रूपेश तेंडुलकर) की सहृदयता, पिता जी (देव सिंह) और माता जी (वंदिता शुक्ला) की वेदना, गौटिया कैलास (समीर चंद्र साहू) और गौटनिन (सिजी सिरमौर) की सत्ता — हर किरदार ने मंच पर अपनी भूमिका को इतनी शिद्दत से जिया कि कहानी सिर्फ देखी नहीं, महसूस की गई। अंत में जब सुखिया अपने भाई से कहती है कि उसने प्रेम और मातृत्व दोनों एक साथ खोए हैं, तो पूरा प्रेक्षागृह मौन हो गया — यही मौन इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी सफलता थी।

संगीत ने इस कहानी में प्राण फूंके। हर्ष चंद्राकर के निर्देशन में साक्षी और खुशी गजेंद्र की गायकी, वेद प्रकाश रावटे की तबला-गुदुम, करन तारम की हारमोनियम-मोहरी, उजित निषाद की बैंजो, सौरभ की बांसुरी और कामेश साहू की दफड़ा वादन ने मातर और गौरी-गौरा जैसे लोकगीतों को नया जीवन दिया। मंच सजावट में हर्ष चंद्राकर और पुनेश ध्रुव, तथा सहयोग में सौरभ, करन कुंजाम, कपील मिरी और स्वास्तिक का योगदान सराहनीय रहा। कोरस टीम — दीपक साहू, हर्षित डेहरिया, आनंद वैष्णल, ओमेंद्र कावडे, चिकू, आकाश चंद्रवंशी, दीपाली और दीक्षा बघेल — ने सामूहिक दृश्यों में मंच की ऊर्जा को बनाए रखा।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा, प्रोफेसर राजन यादव, डॉ. मानस साहू और डॉ. दीपशिखा पटेल ने विद्यार्थियों की इस संवेदनशील और सशक्त प्रस्तुति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। ‘बरदईहा’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि उस अनकहे दर्द की झलक है, जो आज भी कई गांवों की चौपालों में दबा पड़ा है।






